हाकिम
By Shivam Mishra
हाकिम जी की हजूरी में
हाथ जोड़े सब खड़े हैं, मजबूरी में
जोड़े हुए हाथों में भी, हथकड़ियाँ लगी हैं,
हाकिम को हाथ जुड़े हुए पसंद हैं
या शायद, उनके उठ जाने से डरता है।
खिड़की, दरवाजे, सब भीतर से बंद हैं
हाकिम को अँधेरे से प्यार है,
या शायद, रोशनी से डरता है।
रोशनदान सब ढक दिए गए हैं,
हाकिम को हवा का झोंका नहीं पसंद,
या शायद, आज़ादी के ख़्याल से डरता है।
सब के कानों को, कसकर बंद किया है,
हाकिम को शांति पसंद है,
या शायद, शोर से डरता है।
कल रात सर्दी बड़ी, तो अलाव में, सारी किताबें जला दी गईं,
उनमें सवाल बहुत थे,
और हाकिम जवाबों से डरता है।
मैं और आप,
भी वहीं खड़े हैं,
सिर झुकाए, हाथ जोड़े
क्यूंकि हम नहीं जानते, कि जिस हाकिम से हम इतना डरते हैं,
वो हमसे कितना डरता है।
By Shivam Mishra

Comments