हां माना कि हम अनाड़ी हैं
By Anjan Sharma
हां माना कि हम अनाड़ी हैं, हमें सलीका नहीं,
पर बार बार यूं हरा देना ज़िंदगी, ये कोई सही तरीका नहीं।
कोशिशें, हालात, वक्त, रास्ते, तरीके, सब खिलाफ ही थे,
अब इस हार में दोष तो मेरी कमी का नहीं।
फकत उम्मीदें क्यों करनी की दिखेगी उम्मीदों की धूप,
मेरी स्याह तकदीर का रंग इतना भी फीका नहीं।
आसमां की आस तो मैंने कबकी छोड़ दी,
क्यों उड़ना जब ठिकाना अपनी जमीं का नहीं।
पर मांगी नही मोहलत सबसे की अब जीने दो मुझे,
यूं तिल - तिल मरकर जीना, मैंने कभी सीखा नहीं।
By Anjan Sharma

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