हाँ ,मैं मोटी हूँ..!!
By Himanish Harsh
अब सवेरे उठने का मन मेरा करता नहीं ,
उनका अब सामना करने का मन मेरा करता नहीं ।
आज कल तो शीशा भी बत्तियाँ बुझा के देखती हूँ,
पता नहीं कबसे ख़ुद को देखने का मन करता नहीं ।
हाँ ,मैं मोटी हूँ ,यह तुम्हें दिखता है ,
तुमसे थोड़ा ज़्यादा खाती हूँ ,यह तुम्हें दिखता है ।
पास आने से पहले मुँह तुम फेर लेते हो ,
मुझसे दूर जाने के बहाने पहले ढूँढ लेते हो ।
उस सवेरे का इंतज़ार है जब तुम ऐसे मुझे अपनाओगे ,
मैं ख़ुद दूर चलूँगी पास मुझे बुलाओगे।
मनाती हूँ मंदिर पर अब मैं ,मुझमे छुपे इंसान को तुम पहचानो,
दिखावा कोई नहीं है मुझमे इस अन्दाज़ को पहचानो।
एक बार सुनो मेरी ,सोच शायद बदल जाए,
तुम्हारे उन दोस्तों में अगर ज़िक्र मेरा हो जाए।
आगे की सारी बातें मुझपे तुम छोड़ देना,
दोबारा इधर मत देखना अगर महफ़िल मेरी फ़ैन ना हो जाए।
छोड़ दिया है अपने हाल पर अब ख़ुद को ,
क्या बताऊँ अपनी आप बीती सबको ।
ख़ुश हूँ मैं अब जैसी भी हूँ ,
आँखे नम है,मैं अपने में हूँ।
हाँ मैं मोटी हूँ ! हाँ मैं मोटी हूँ !
छोड़ दी है मैने उम्मीद सबसे ,
चुन ली है मंज़िल अबसे ।
शायद ऊँचाइयों पर जाने के बाद मेरा काम पसंद आए,
दुनिया मेरे काम से मेरे पास आए ।
तब चुन लूँगी तुमको उन सबमे से ,
हाँ मैं मोटी हूँ जानती हूँ कबसे |
By Himanish Harsh

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