हवाओं में खुशबुओं की तरहां.
By Harsh Vardhan Poddar
जब उलझ जाता हूं रेशम के धागों की तरहां,
तब कलम की लकीरें सुलझा देती है मुझे शब्दों की तरहां ।
जब लिखना चाहता हूं तब लिख नहीं पता अपने खयालों की रझ्जा,
तब घुट बनकर उतरते है विचार मेरे सीने में सुलगते अन्नगारों की तरहां ।
जब खो जाता हूं एक बेनाम किताब की तरहां,
तब नाम लिख देती है हवाओं में वो मेरा खुशबुओं की तरहां।
By Harsh Vardhan Poddar

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