हल्का सा रंग है चढ़ा दूर कहीं।
By Raj
हल्का सा रंग है चढ़ा दूर कहीं।
मैं चुपचाप सा बैठा देख रहा हूँ।
महक रही हवा चाय की खुशबु से,
मैं सिमटा हुआ महसूस कर रहा हूँ कहीं।
मेरे सामने ना आना,
मैंने उगता सूरज बहुत कम देखा है।
जरा दूर से गुजर जाना..
मैंने खुद के लिए पलों को चुराया है अभी।
आज सांस है,कल किसकी आस है।
मैं तो राज़ हूँ। हर किसी के पास हूँ।
भूले से बिछड़ जाना ना कहीं।
ये सवेरे का पीला चाँद नजर आना है यहीं।
मेरी मानो तो तुम भी समेट लो ये सब।
दौलतो से हर कोई खुश है भी नही।
खैर समझाना बेकार सा लगता है।
चुप ही रहने में मज़ा सा आता है।
ओहो कप की चाय ठंडी हो ना जाए कहीं।
ये उगता सूरज आस्मां को छू जाए ना कहीं।
निगेबां नज़र बनी हुई है। एक टक सीधी खिची हुई है ।
भोर का शोर है रोज सुनूंगा। मैं भी हिस्सा हूँ यहीं कहीं मिलूँगा।
और अचानक से किसी परिंदे ने सूरज को छेदने की हिम्मत दिखाई।
थोड़ी दूर तक तो वो दिखा उसके बाद उसकी परछाई भी नज़र न आई।
लगता है दूर निकल गया है। या शायद भटक गया है कहीं।
By Raj

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