हलाहल
By Sanjay Upadhyay
ख़ौफ़ इतना हो चुका है, कि चमन में तितलियाँ आती नहीं,
क्या, फ़िज़ाओं में बसी शर्मिंदगी है दोस्तों…?
अब दरख़्तों पर कहीं भी, घोंसले दिखते नहीं हैं पंछियों के,
क्या, बस टहनियों पर बची हैवानियत है दोस्तों…?
खामोशियाँ पसरी हुई है, रास्तों पर साख़ से पत्ते गिरे हैं ,
क्या बरगदों पर चढ़ गई अब वहशियत है दोस्तों…?
ज़हर का भंडार भेजा जा चुका है, मस्जिदों और मंदिरो को
क्या ,अब हलाहल से हलाहल ही धुलेगा दोस्तों…?
By Sanjay Upadhyay

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