हर सूं तेरे होने का गुमां
By Umar Allahabadi
हर सूं तेरे होने का गुमां होता है,
मूंदूं पलकें तो मेरे दिल में अयां होता है,
बिखरता है मुझमें तू खुशबू की मानिंद,
मेरी सांसों में सांस बनके रवां होता है,
हर एक हर्फ तेरे एहसास से यूं संवरते हैं,
मेरी गज़लों का तू ही हम-जबां होता है,
मेरे अल्फ़ाज़ की पाकीज़गी तेरे ख्यालों से है,
मेरे जज़्बात पे तू इस क़दर मेहरबां होता है,
इतना दिलकश है तेरा ज़िक्र मेरी गज़लों में,
रश्क करता है तुझपे, चांद पशेमां होता है,
उमर को अपने वस्ल से यूं महरुम ना रख,
रूह के रिश्तों का अल्लाह निगाहबां होता है।
By Umar Allahabadi

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