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हर जगह विज्ञापन

राहुल को पहले कभी यह महसूस नहीं हुआ था कि वह किसी बाज़ार में नहीं, बल्कि बाज़ार उसके अंदर रहता है। सुबह उठते ही उसकी आँखें मोबाइल स्क्रीन पर जातीं, और स्क्रीन खुलते ही रंग-बिरंगे ऑफ़र, “लिमिटेड टाइम सेल”, “अभी खरीदें”, “सिर्फ आज के लिए” जैसे शब्द उसकी चेतना पर दस्तक देने लगते। वह अभी पूरी तरह जागा भी नहीं होता, लेकिन उसकी इच्छाएँ जाग चुकी होतीं।


बाथरूम के शीशे के सामने खड़े होकर वह दाँत ब्रश करता, तो टूथपेस्ट का विज्ञापन उसे याद आता—“सफेदी ऐसी कि सब मुड़कर देखें।” नाश्ते की मेज़ पर बैठते ही टीवी पर कोई सीरियल नहीं, बल्कि उनके बीच में घुसते विज्ञापन—कभी नया फोन, कभी नई बाइक, कभी ऐसा परफ़्यूम जो आपको “अट्रैक्टिव” बना दे। हर चीज़ के साथ एक वादा जुड़ा होता—अगर यह खरीदोगे, तो ज़िंदगी बेहतर हो जाएगी।


राहुल ने कभी सोचा ही नहीं था कि उसकी ज़रूरतें असल में कितनी कम थीं। लेकिन विज्ञापनों की दुनिया ने उसकी इच्छाओं की सूची लंबी कर दी थी। उसके पास पहले से ठीक-ठाक फोन था, पर एक नए मॉडल का विज्ञापन देखकर उसे लगने लगा कि उसका फोन “पुराना” है। उसके पास जूते थे, पर नए ब्रांड के जूतों का विज्ञापन कहता था—“बी द ट्रेंड।” और राहुल को लगा, शायद वह ट्रेंड में नहीं है।


एक दिन उसने ध्यान से देखा—बस स्टॉप पर खड़े-खड़े भी दीवारों पर बड़े-बड़े होर्डिंग्स चमक रहे थे। मेट्रो के अंदर डिजिटल स्क्रीन पर स्किनकेयर से लेकर इंश्योरेंस तक सब कुछ “जरूरी” बताया जा रहा था। सोशल मीडिया खोलो तो इन्फ्लुएंसर मुस्कुराते हुए कह रहे हैं—“मैं तो यही इस्तेमाल करता हूँ।” हर जगह एक ही संदेश—तुम अभी अधूरे हो, और यह उत्पाद तुम्हें पूरा कर देगा।


धीरे-धीरे राहुल की खरीदारी बढ़ने लगी। पहले महीने में उसने नया फोन खरीदा। अगले महीने ब्रांडेड कपड़े। फिर जिम मेंबरशिप—क्योंकि एक विज्ञापन में दिखाया गया था कि फिट शरीर ही आत्मविश्वास की चाबी है। कुछ दिन तक सब अच्छा लगता। नया सामान, नया उत्साह। लेकिन कुछ ही समय बाद वही चीज़ें सामान्य हो जातीं। फिर कोई और विज्ञापन उसे याद दिलाता कि अभी भी कुछ कमी है।


राहुल को लगा जैसे वह एक दौड़ में है—जहाँ फिनिश लाइन कभी आती ही नहीं। हर बार जब वह सोचता कि अब सब है, तभी एक नया “मस्ट-हैव” सामने आ जाता। उसने देखा कि उसकी अलमारी भरती जा रही है, लेकिन मन खाली होता जा रहा है।


एक शाम वह अपने कमरे में बैठा था। ऑनलाइन शॉपिंग ऐप खुला हुआ था। कार्ट में तीन चीज़ें पड़ी थीं—एक नई घड़ी, एक हेडफोन, और एक जैकेट। उसने खुद से पूछा, “क्या सच में मुझे इनकी ज़रूरत है?” कुछ देर के लिए स्क्रीन पर उँगली रुक गई। पहली बार उसने महसूस किया कि यह चाहत उसकी अपनी नहीं, बल्कि बनाई गई है।


उसे याद आया कि बचपन में वह कम चीज़ों में भी खुश था। एक साइकिल, कुछ किताबें, दोस्तों के साथ खेल। तब कोई उसे नहीं बता रहा था कि वह अधूरा है। तब खुशी खरीदी नहीं जाती थी, जी जाती थी।


राहुल ने सोचा—विज्ञापन सिर्फ चीज़ें नहीं बेचते, वे असुरक्षा बेचते हैं। वे पहले हमें यह महसूस कराते हैं कि हम पर्याप्त नहीं हैं, और फिर समाधान के रूप में उत्पाद सामने रख देते हैं। यह एक चक्र है—असंतोष पैदा करो, समाधान बेचो, फिर नया असंतोष पैदा करो।


अगले दिन उसने एक प्रयोग किया। उसने तय किया कि वह एक हफ्ते तक कोई अनावश्यक चीज़ नहीं खरीदेगा। सोशल मीडिया का समय कम किया। टीवी कम देखा। धीरे-धीरे उसे महसूस हुआ कि उसकी इच्छाएँ शांत हो रही हैं। जो चीज़ें पहले “जरूरी” लगती थीं, अब साधारण लगने लगीं।


उसे समझ आया कि बाज़ार का शोर जितना बाहर है, उतना ही भीतर भी है। और जब तक वह उस शोर को पहचान नहीं लेगा, वह उसी लय पर नाचता रहेगा।


कुछ महीनों बाद राहुल की आदतें बदल चुकी थीं। वह अब भी चीज़ें खरीदता था, लेकिन सोच-समझकर। वह अब विज्ञापन को देखता था, पर उस पर तुरंत विश्वास नहीं करता था। उसने सीखा कि हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती, और हर “ऑफर” असल में अवसर नहीं होता।


उसे यह भी समझ आया कि उपभोक्ता होना बुरा नहीं है, लेकिन बिना सोचे-समझे उपभोक्ता बन जाना खतरनाक है। क्योंकि तब हम चीज़ें नहीं खरीदते, चीज़ें हमें खरीद लेती हैं।


और उस दिन, जब उसने बिना कुछ खरीदे अपनी कार्ट खाली की, उसे एक अजीब-सी आज़ादी महसूस हुई—जैसे उसने सिर्फ पैसे नहीं बचाए, बल्कि अपनी इच्छाओं पर अपना अधिकार वापस पा लिया हो।

 
 
 

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