हमसफर
By Rajesh Kumar Verma
हम बढ़ते गए जिंदगी के सफर में
कारवां मिलता चला गया।
कुछ अपने हुए कुछ पराए
रिश्तों का सिलसिला बनता गया।
ठोकर लगी सफर में जब
तब किसी ने उठाकर गले लगाया।
कोई हमराही हमसफ़र बना
हमराज बनकर साथ निभाया।
सुख-दुःख में साथ चलने
साथ जीने की उसने कसमें खायीं।
रिश्ते हुए दृढ़ तब जब आगे बढ़कर
उसने कदम से कदम मिलाया।
वरना मैं तो टूटी डाल का पत्ता था
गिरकर बिखरना शेष था।
तब हाथ थामकर जिसने संभाला
लगा वक्त ने उसे मिलाया।
साथ-साथ चलने से उसके
सफर अब आसान लगने लगा।
सफर शुरू किया था अकेला
जिंदगी का कारवां मिल गया।
न शिकवा न शिकायत बस एक धुन
साथ चलते रहने की।
साथ चलते-चलते सफर बदल गया
और कारवां गुजर गया।
By Rajesh Kumar Verma

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