हम थे!
By Shruti Lodha
टुकड़े थे यू पढ़े ये ज़मीन पे
काश के लफ्ज़ बिखरे थे उस सफर की कमीज़ पे
दरिया था लांघा उन जख्मों की हेसियत पे
मरहम की गुंजाइश में मरहम भी हसीन थे
ये अक्स था समाया उस चोट की सितम पे
बेखबर में बिचारा सोच की सिसक में
नज़ारों के कई नज़ारे थे इस नज़र पे
डूबतेहुएसूरजकेहमकफ़नथ
By Shruti Lodha

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