हम कोई लफ्ज़ सोचें तो
By Umar Allahabadi
हम कोई लफ़्ज़ सोचें तो...
वो ज़हन में एक तस्वीर सी बनाती है,
वो लफ़्ज़ जरिया है एहसासात बयां करने का,
वो लफ़्ज़ आईना है हमारे एहसासात का,
वो आईना जिसमें हमारे जज़्बात नज़र आते हैं,
वो जज़्बात जिनका राब्ता सिर्फ तुमसे है,
वो राब्ता जो ज़मीं का फसल से है,
वो राब्ता जो बारिश का बादल से है,
वो बारिश जो तुम्हारी यादों जैसी है,
वो यादें जिनमें भीगना मेरा मुकद्दर है,
वो मुकद्दर जिसमें सिर्फ तुम्हारा नाम है,
वो नाम जो अब से हमारा नाम है,
वो नाम सिला है हमारी मोहब्बत का,
वो सिला जो खुदा की नेमत है,
वो नेमत वाबस्ता है हमारी वफाओं से,
वो वफा जिसकी पहचान सिर्फ तुमसे है,
वो तुम हो जो मेरे होने की वजह है,
वो वजह जो सबब है हमारी मोहब्बत का,
वो मोहब्बत जिसका नूरानी चेहरा हो तुम...
मोहब्बत लफ़्ज़ सोचूं तो मुझे तुम नज़र आती हो।
By Umar Allahabadi

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