हौसला
By Nidhi Pant
ज़मीं से आसमां की ओर चलने की तू सोच रख। जो हाथ भी ना आ सका वो
वक़्त तू झुकाएगा। ब्रह्माण्ड की कोई शक्ति भी तुझे नहीं झुका सके ,
तू हौसला बुलंद रख। बस एक बात याद रख, तू खुद तुझे स्वीकार्य है तो करता
क्यों प्रतिकार है। ये रण है अस्मिता का ना कोई शून्य ना हज़ार है।
दूसरों के तर्क से ठगा सा क्यों खड़ा रहे,
हो दृढ़ तू पर्वतों सा और समुद्र सी गहराई रख। यहां ना कोई मित्र है ना कोई शत्रु है
यहां, खुद ही का तू सहारा बन और अपनी ही मिसाल दे।
मंज़िल से जब हो सामना ,तो ख़ाक में मिल जाएगा, तर्क से कुतर्क तक अवरोध का
वो पैंतरा। आज से क्यों अब से ही जीतने की जिद चढ़ा,
बुलंदियों के ताज को तू ही सिर चढ़ाएगा।
By Nidhi Pant

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