स्वेटर
By Deepika Oberoi
माँ के हाथ का बुना स्वेटर आज भी याद आता है
वो सिर्फ स्वेटर नहीं माँ का प्यार था, जो सर्द हवाओं में गर्मी का एहसास कराता था
स्वेटर में खाने की खुशबू उसकी उँगलियों से स्वेटर तक का रास्ता तय करती है, वो खाने की खुशबू आज भी याद आती है
माँ के हाथ का बुना स्वेटर आज भी याद आता है
इन्द्रधनुष बिखेरते रंग स्वेटर मे ऐसे समा जाते थे, जैसे पंख फैलाता मोर या रंग बिरंगी तितली
मुंबई में ठंड नहीं पर स्वेटर पहनने को तरस जाती हूँ
स्वेटर का नाम सुनते ही माँ की यादों मे खो जाती हूँ
माँ के हाथ का बुना स्वेटर आज भी याद आता है
सिलाईयो पर हाथ ऐसे चलते थे माँ के जैसे गति पकड़ती राजधानी हो तरह के स्वेटर बुन आपने पापा का साथ देने की ठानी हो आज भी बुनती हो स्वेटर तमाम दुनिया के लिए क्या हुआ अगर मैं पहन नहीं सकती, एक बुन दो ना माँ मेरे लिए भी तेरी खुशबु, तेरी यादें बस जाएगी उसमे तमाम उम्र के लिए जब कभी आएगी याद, स्वेटर को चिपका लूँगी सीने से मैं भी माँ के हाथ का बुना स्वेटर आज भी याद आता है in वो सिर्फ स्वेटर नहीं माँ का प्यार था, जो सर्द हवाओं में गर्मी का एहसास कराता था
By Deepika Oberoi

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