स्वर्ण लघु पथ
By Swati Sudha
अस्सी नब्बे के दशक में हमारा भी धा एक जमाना,
जब हमने बड़ों को सुना और माना,
बड़े होने पर जाना, जरूरी है छोटों को सुनना,
आशावान होकर ,छोटों की भी सही गलत बातों को सुना।
छुटपन से ही हमें ,अधिकारों की जगह मिले कर्त्तव्य ,
जिसे हमारी पीढी ने निभाए, हँसते- हँसते,
पुरानी पीढी को दिया मान, नयी पीढी को दिया स्थान ,
जो नहीं दे पायी ये पीढी ,वो अपने आपको पहचान।
ये संक्रमण काल की पीढी थी, जिसने थोड़ा गाँव और थोड़ा शहर देखा,
जिसने बड़ों का रौब ,और छोटों की कर्त्तव्यपरायणता देखी,
जिसने शिक्षकों के आगे नतमस्तक हो ,अपनी आवाज को दबाया
उसने तकनीक को जीवन का हिस्सा नहीं, घर से बाहर की चीज माना।
यह पीढी जो पुल बनी, पुरानी सोच और नई तकनीकी सोच के बीच,
यह वो पीढी है जिसने नई पीढी को वो दिया ,जो उसने खुद नहीं लिया?
माँ- बाप की बातों को आत्मसात करते हुए, उसने नई पीढी की बातों को भी समझा?
सोचा जाए तो, सैंडविच एक आसान सा नाम हो सकता है इस पीढी का।
परंतु हमारी पीढी की पहचान है सकारात्मकता,
तो फिर नाम भी होना चाहिए खुशियों से दमकता,
जीवन भर निभाते रहे हम लघु पथ की भूमिका,
तब क्यों न हम इसे नाम दे स्वर्ण लघु पथ सा चमकता।।
By Swati Sudha

Comments