स्वयं को मैं विजय करूं
By Ankit Kumar
पर्वतों की श्रृंखला को
मोड़ कर धनुष करूं,
और नदी की डोरी को
मैं प्रत्यिंचा में बटऊं।
रश्मियों की तीक्ष्णता
भली तरह तराश कर,
एक-एक रश्मि को
शरों सा मैं प्रखर करूं।
न अस्त्र और चाहूं मैं ,
न शास्त्र की है कामना,
प्रकृति की गोद में,
स्वयं को मैं विजय करूं।
By Ankit Kumar

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