स्वप्न मेरा की तुम यहीं हो
By Bhuvanesh Arya
वो स्वप्न मेरा की तुम यहीं हो,
देखूँ कुछ, तुमको नयन में,
बाँध लूँ फिर इक पल पवन मैं,
मेरी मुट्ठीयों की सरहदों मे।
ठहर जाये संसार पवन मे,
रोक लूँ मैं धरती गगन ये,
कह दो तुम अपने हर दिल की बात,
बहने दो सब इन अश्रु नयन मे।
वो स्वप्न मेरा की तुम यहीं हो,
देखूँ कुछ, तुमको नयन में।
वो बातें अब सुनता रहूं मैं,
गढ जायेंग की भीत हृदय मे,
जग रीत प्रीत पढ़ता रहा मैं,
सब भूल गया अब अश्रु नयन में।
वादों का है दोर चला पर मैं,
मैं साथ निभाउॅगा हर पल मे,
उन वादों का भी मोल है क्या,
जो बीत जाये गुज़रे हुए कल मे।
वो स्वप्न मेरा की तुम यहीं हो,
देखूँ कुछ, तुमको नयन में।
साथ रहूँगा, साथ ढ़लूंगा,
साथ खिलूंगा अब हर कल मे,
साथ चलूंगा, साथ मरूंगा,
हर साथ बनूँगा हर पल मे।
रिश्ता तुमसे, तुम्हारे नयन से,
तुम्हरी अंदर के हर एक दमन से,
देखूँ तुमको हर स्वप्न मे मैं,
मेरे स्वप्न भी तुम्हारे स्वप्न से।
वो स्वप्न मेरा की तुम यहीं हो,
देखूँ कुछ, तुमको नयन में।
हैगहराईयोंमेंश्वासजितना,
सबवादियोंकेपासहै,
हरपलमेंभीअबउससेज़्यादा,
मुझेजीनातुम्हारेसाथहै।
वोस्वप्नमेराकीतुमयहींहो,
देखूँकुछ, तुमकोनयनमें,
स्वप्नमेरा, स्वप्ननाहो,
सचकरदोइसेअबहरपलमें।
तुमपासहो, तुमयहींहो,
औरदेखूँमैंतुमकोनयनसे।
By Bhuvanesh Arya

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