स्वप्न में जीवन पथ पर
By Shivendra Nath Gupta
वो दिन था कुछ लगता असामन्य सा,
जिस दिन जब इस जीवन पथ में,
बस एक छिन्न पात्र ले कम्पित कर में,
कुछ मधु - भिक्षा की रटन थी इस अधर में,
इस बिन देखे अनजाने नगर में,
देखो ना जाने कहां से आ गया था एक अंकिचन,
वो दिन था जब जीवन के पथ में,
उससे थी लोगों की आंखे ललचाईं,
उनसे से खुद उस पथ पर देखो तो कुछ स्वयं मानने आईं,
मन की ये मधु सरिता देखो कैसे उफनी अकुलाई,
जैसे आए थे वो देने को अपना सब संचित धन,
लगा ऐसा जैसे देखो उस दिन इस वीरान पड़े जीवन पथ में,
खुद इन फूलों ने पंखुड़ियां खोली बिछाई,
ये आंखें न जाने क्यों बस करने लगी देखो ठिठोली,
इस ह्रदय ने ना सम्भाली देखो अपनी झोली,
कैसे देखो लूटने लगे थे ये विकल पगन मन,
उसे दिन जब जीवन के पथ में,
खुद ही देखो कैसे भर आता छिन्न पात्र में,
वो मंद मुस्कान के आनंद का रस बरबस सा था न समाता,
वो खुद स्वयं चकित सा स्तब्ध खड़ा था,
समझ ना आता था उसको कि कहां छुपा था ऐसा सुनहरा मधुबन,
उस दिन जब जीवन पथ में मधु मंगल की वर्षा होती थी,
तब कांटों ने भी देखो पहन के मोती पथ सजाए,
जिसे बटोर रही थी देखो उसके मन की रोटी आशा,
समझ के मिला इस अकिंचन से जैसे उसे छुटकारा था,
एक स्वप्न में जो वो अपना धन मान के सब बटोरे जा रहा था,
पर खुली आंख तो वही सब था उसके जीवन के उस पथ में....
By Shivendra Nath Gupta

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