स्वगत ही सही
By Rashmi Prabha
मैं वाल्मीकि बन जाना चाहती हूँ
क्योंकि अपने मन के अरण्य में
कोई वाल्मीकि मुझे नहीं मिला
कहा तो बहुत कुछ
पर वाल्मीकि के अभाव में
सब अलिखित रहा
अब लिखना चाहती हूँ स्वआयण
क्योंकि इस कथा के स्व में
कई स्त्रियों की कथा होगी ! …
अनकहे सम्वादों का दर्द लेकर
मैं नहीं मरना चाहती
अपने अधमरे सच में प्राण फूंककर
आधी साँसों के संग
जीवन व्यर्थ नहीं करना चाहती
.........
निःसंदेह - अब तक
मैं अपने संस्कारों से लड़ती आई हूँ
पर अब
वाल्मीकि बनना ज़रूरी है
अपशब्दों के प्रहारों के निशान दिखाना आसान नहीं होता
वाल्मीकि भी नहीं दिखा पाए होंगे
शायद तभी खुद के संस्कारों से हारकर
अग्नि से सीता को बचाकर भी
उन्होंने सीता के धरती में जाने की कथा व्यक्त की !
आह!
बात अग्नि की हो या भूमि में समाने की
ये ज़ख्म न भरते हैं
न पूरी तरह रिसते हैं
वाल्मीकि होने की चाह की है
तो इनमें कलम को डुबोना सहज नहीं
पर डुबोना तो होगा ही....
जो कथा वाल्मीकि ने नहीं कही
वह मुझे ही कहनी होगी
- स्वगत ही सही ..........
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By Rashmi Prabha

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