स्मृतियों का बचपना
By Prateek Srivastava
तो आपको लिए चलते हैं आज से 15 साल पहले। सुबह आजी के हाथ का बना नून_तेल_रोटी का चोंगा लिए रास्ते मे खाते- खाते कब स्कूल पहुंच जाते, पता ही नही चलता था.. रास्ते भी हमारे दो थे। एक तिरछे, एक रोड से.. जब तिरछे जाते थे तो कभी कोई खेत से मूली कबारने के लिए लाठी लेके दौड़ा लेता था तो कभी कोई आम तोड़ने के लिए। जब रोड से जाते थे तो अनजान लोगों की साईकल रुकवा कर उसपे बैठ के स्कूल पहुंचते थे और अगर कोई ठेला वाला मिल गया तो हमारी बल्ले बल्ले। रूकवाना ही नही पड़ता था, झूल के बैठ जाते थे.. हालांकि हमारे मित्र लोग ट्रेक्टर पर भी झूल जाते पर हम टाली के पीछे " लटकले त गईले बेटा" वाले चेतावनी को बहुत सीरियसली ले लेते थे..
कहानियां और किस्से तो इतने हैं कि ना हम बयान कर पाएंगे ना आप पढ़ पाएंगे।
तो रास्ते की बात बन्द करते हैं और अब स्कूल पर आते हैं।
आजकल के बच्चे तो मार भी नही खाते स्कूल में, एक हम थे, खँचाते थे.. वो भी तबतक जबतक की गुरुजी का गुस्सा शांत न हो जाये.. और जरूरी नही कि आपकी गलती हो तभी आप मार खाएंगे, बस गुरुजी का मन होना चाहिए..
उसी में एक थे श्री लक्ष्मीकांत तिवारी गुरुजी।
गुरुजी के नाम भी अलग- अलग रखे गए थे हमारी मित्रमंडली के द्वारा।
बुरा मत मानियेगा पर अपने बचपन मे हमलोग इनको 'मरखहवा सर' के नाम से जानते थे
हमारा स्कूल पीपल के पेड़ के पास था.. और स्कूल के छत पर उसकी डालियां फैली हुई थी। गुरुजी गोदा (पीपल का फल) खूब खाते थे और हमको तो लगता है कि गोदा का ही असर था जो गुरुजी का मार हमको आज तक याद है। गुरुजी पढ़ाते भी बहुत अच्छा थे। स्कूल में सरस्वती पूजा में इनकी ही मुख्य भूमिका होती थी। जब भी इनसे नजरें चार होती थी तो ये अपना मुड़ी हिलाने लगते थे जिसका मतलब “मिलो तुमको बताता हूँ" होता था। हमको अच्छी तरह से याद है गुरुजी हमको एकबार छत पर से नीचे लटका दिए थे और हम खूब रो रहे कि “नहीं गुरुजी! आज के बाद ऐसा कभी नही होगा"..
आज बाजार में घूमने के दौरान गुरुजी मिल गए भानु चाचा के दुकान के बगल में.. भला हो पिताजी का, अगर वो हमारा ध्यान आकृष्ट ना कराते तो हम उनका आशीर्वाद पाने से भी चूक जाते। गुरुजी से मिला तो बहुत खुशी हुई, मेरा मन उनको लाख धन्यवाद दे रहा था.. हम जो भी हैं उनमे उनका बहुत योगदान रहा है...
हमने बिना देर किए गुरुजी के चरण स्पर्श किये और साथ ही फोटो भी खिंचवा लिया, क्या पता फिर कब मुलाकात हो..
आखिरी में बस इतना कि,
काश कि वो दिन फिर वापस आ जाते जब आप हमको पढ़ाया करते थे, डराया करते थे और हम अपने नटखटपने से बाज नही आते थे।
By Prateek Srivastava

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