स्मृति
By Sanjnna Girdhar
स्मरण करती हूँ उन दिनों का,
जब यहाँ शांति थी।
मेरा आँचल वनस्पतियों से परिपूर्ण था,
वायू शुद्ध हुआ करती थी और जल पवित्र।
पशु-पक्षी इत्यादि जीव अमन से जीवन यापन करते थे,
जब प्रेम सर्वोपरि था।
फिर मेरे गर्भ से मानवता का जन्म हुआ,
मनुष्य का जन्म, मेरी उत्कृष्ट और अद्भुत रचना।
मनुष्यों के आगमन से विविध प्रकार के आविष्कार हूए,
प्राचीन समय में तो मानव सभी जीवों के साथ मिल-जुलकर रहता था।
पारिस्थितिकी संतुलन भी बना हुआ था,
और मेरी समस्त रचनाओं में एकता थी।
परंतु समय के साथ मानवता ने विकास किया,
और शेष प्रजातियाँ पीछे छूट गयी।
मनुष्यता ने प्रगतिशीलता की पराकाष्ठा तो स्थापित की,
किंतु परमार्थ के लिये नहीं, केवल स्वार्थ के लिये।
वह महत्वाकांक्षा की अग्नि में इतना तपता रहा कि अपनी जननी अर्थात "मैं, पृथ्वी" को ही भूल गया,
मेरी ममता असीम है परंतु मेरी सहनशीलता की सीमा है।
यदि अज्ञान के अंधकार में लुप्त, मनुष्य इसी प्रकार पतन की ओर बढ़ता रहा,
तो मेरा अंत निश्चित ही नहीं अपितु समीप भी है।
मानवगण मेरी रक्षा करने के नारे लगाते हैं,
मैं उन्हें यह स्मरण कराना चाहती हूँ कि मैं अपनी रक्षा स्वयं करने में सक्षम हूँ।
मुझे यदि उनसे कोई अपेक्षा है तो वह है स्वतंत्रता और शांति की,
मुझे पुनर्वार शुद्ध वायू, पवित्र जल और वनस्पतियों से धिरा हुआ आँगन चाहिए जहाँ मेरी संतानें सुख समृद्धि से जीवन व्यतीत करें।
और मैं संतोष की श्वांस ले सकूँ।।
– स:प्रेम व ममता "पृथ्वी"
By Sanjnna Girdhar

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