स्त्री एक वीरांगना
By Soni Bhardwaj
अदम्य साहस है तुम्हारा श्रृंगार,
अपराजित, वीरांगना सी हो अंगार।
परिवार वृक्ष का बन आधार,
पूर्ण करती सम्पूर्ण संसार।
बेटी बन लाती खुशियाँ हजार,
बहन बन देती माँ का प्यार।
सखी बन करती अठखेलियां,
पत्नी बन, बन जाती मुटियार।
गृहलक्ष्मी बन, बुनती नया संसार,
‘माँ’ बन देती जीवन उपहार।
हे स्त्री, गर्भधारण से अंतरिक्ष तक।
युद्धस्थल से आत्मसम्मान तक।
आदि से अंतकाल तक।
जन्म से कंकाल तक।
तुम परिपूर्ण हो,
तुम सम्पूर्ण हो।
By Soni Bhardwaj

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