-स्त्री-
By Sakshi Joshi
हाँ! हूँ मैं स्त्री पर,
वो नहीं जो कल तक थी!
कल तक मरने की चाह थी,
पर आज आशा है जीने की!
कल तक थे आँखों में आँसू,
पर आज नैनों में ज्वाला है!
कल तक था डर अंधेरों का,
पर आज नया उजाला है!
कल तक ना नींद थी,
पर आज सपने देखें हैं !
कल तक न चैन था मन को,
पर आज सपनों को भी पाला
है!
कल तक सबने माना था जिसे,
धन पराया आज,
अपना गर्व माना है!
कल तक रखा जिसे विद्या से परे,
आज उसने ही विद्या का,
असली अर्थ बताया है!!
हाँ! हूँ मैं धरती माँ जैससी
सहनशील,
पर अब नहीं सहूँगी अत्याचार
मैं !
कल तक जिसके लिए सर झुकाया था ,
आज उसी ने सर उठाकर जीना सिखाया है!
कल तक दुनिया ने जिस स्त्री को देखा,
आज उसका नया रूप सामने आया है!
कल तक जिसके बन्धनों में बंधे थे कदम,
आज उसने दुनिया के कदम-से-कदम मिलाया है!
कल तक थी अपने अधिकारों से परे,
पर आज अपना हक जाना है!
हाँ वो स्त्री ही थी जिससे
यमराज से,
सत्यवान के प्राण छीन
लाए थे!
हाँ वो स्त्री ही है,
जो धरती पर बदलाव
लाएगी !
हाँ! हूँ मै स्त्री,
पर नहीं कल तक की अबला नारी !
हाँ! हूँ मै स्त्री,
जो आज है और कल भी उजागर करती रहेगी!!
By Sakshi Joshi

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