सोच तो ज़रा क्या होगा
By Inder Raheja
इतना तो है यकीन खुद पे, क्या लगेंगी बंदिशे मुझपे
अरे नींव है अगर आसमान तो, अंत ऊंचाई का मेरी तू
सोच तो ज़रा क्या होगा।
गाड़ झंडा क्षितिज पर कही, रोकू उड़ान मैं आसमान की
तो हाल उसकी बेचैनी का सोच तो ज़रा क्या होगा।
चमकूँगा धरती से इतना, सूरज से चाँद दिखाई दे,
दिन का होगा आलम ये तो, रात का नज़ारा वहाँ से सोच तो ज़रा क्या होगा।
सबसे ऊंचे पर्वत से जब मेरा एक अरमान गिराया जाएगा, धरती पे कुछ तितली जैसा बिखरा नज़र आएगा,
इतनी रंगीन है अगर काया उसकी, तो असली का स्वरूप उसका सोच तो ज़रा क्या होगा।
बादल के सीने में बिजली तो धड़के जाएगी, लेकिन उसकी गर्जन तो मेरी आवाज तले दब जाएगी,
ये होगी गर गूंज मेरी तो दहाड़ का अंजाम तू सोच तो ज़रा क्या होगा।
एक हाथ से खींच लकीरो को उड़ान की डोर पे बांधेंगे, तो दूसरे की मंज़िल के रास्तों पे साधेंगे,
अब माथे से उधड़ी लकीरो का सोच तो ज़रा क्या होगा।
तेज़ दौड़ती लहरो में जब ख्याल डूबने लगते हो,सागर के किनारे बढ़ के तलवे छूने लगते हो,
कल्पना के पात्र,एहसासों का भारीपन सोच तो ज़रा क्या होगा।
मंज़िल से जब नज़रे मेरी झुक कर सबको देखेंगी, मुझे लगे खरोच पर चींखें सबकी निकलेंगी,
ऐसे में मेरी बातों का असर वहां से सोच तो ज़रा क्या होगा।
By Inder Raheja

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