सूर्य की नियति
By Mohan Jha
उषा की लालिमा की मौन प्रस्तुति को समझ पाते;
प्रभा की अरुणिमा की मूक स्तुति को समझ पाते;
समझ पाते प्रतीची टीवी की व्यथा सन्ताप प्राची की,
कदाचित् दग्ध दिनकर के शिखर का रेख पढ़ पाते।
प्रभाकर तुष्ट प्राची के भवन किञ्चित् ठहर पाते;
न होकर कुपित फिर सद्यःअनल मार्त्तण्ड बन पाते;
प्रतीची सदन है सन्निकट दिवाकर की शिथिलता को,
विकलता को विवशता को कदाचित् हम समझ पाते।
निशा की स्याह पृष्ठों पर लिखा संदेश पढ़ पाते;
समय संकेत असमय श्वानक्रन्दन को समझ पाते;
समझ पाते उदधि के गर्भ से उठते भँवर को,
तेरी भाषा विधा 'मोहन' कदाचित् हम समझ पाते।
By Mohan Jha

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