सूरत-ऐ-जेबा
By Shashikant Jha 'Malang'
सूरत-ऐ-जेबा को यूँ जाया न कीजिये
महफ़िल में सरे आम यूँ आया न कीजिये
पहले ही कायल हो चुके तेरे हुस्न के
अब जुल्फे बिखेर के हमे घायल न कीजिये
खैरियत की गुफ़तगू बहुत हुई हमसे
कभी हाले-दिल की तन्क़ीह तो कीजिये
माना आशिक़ बहुत ज्यादा है कतारों में
पर कभी अपने मुरीद की आज़माइस तो कीजिये
मरते तो हो आप भी, पर डर है ज़माने का
लड़ लेंगे पूरी खुदाई से, हमे मौका तो दीजिये
बस थाम लो हाथ मेरा, बहुत तनहा हूँ मैं
अधमरे आशिक़ को पूरा जिन्दा तो कीजिये
By Shashikant Jha 'Malang'

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