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सुनो अर्जुन

Apr 27, 2023
4 min read

By Rashmi Prabha


अर्जुन,

जब मैं राम बना था,

तब मेरा ही अंश क्रमशः

भरत,लक्ष्मण,शत्रुघ्न थे ।

लेकिन किलकारी को आतुर

पिता दशरथ और तीनों माताओं ने

मेरे पहले आने के हर्ष में

अधिकांश वक़्त मेरी बाल लीला को दिया

अतिरिक्त खीर का मिठास मुझे दिया ...

आज्ञाकारी भाइयों के मन में खराश का होना

या बाकी दोनों माताओं

कैकेई और सुमित्रा की उदासी

अनकही होकर भी

एक स्वाभाविक स्थिति थी,

शायद इसी दृष्टिकोण में

हमारे मध्य

सहज भाई-बहनों जैसी लड़ाई नहीं हुई ।

वनवास मुझे मिला था,

परन्तु पतिव्रता धर्म निभाने में

माँ सुमित्रा ने

भाई लक्ष्मण को मेरे साथ भेज दिया

तो मैं और सीता

उर्मिला के आगे दोषी हो गए ।

यह भाई होने का कर्तव्य निभाने जैसा

बिल्कुल नहीं था,

बेवजह वजह बनाकर

बिना किसी वचन के

लक्ष्मण को भी चौदह वर्षों का वनवास मिला ।

नाना के घर से

जब भाई भरत और शत्रुघ्न लौटे

तो पूरी अयोध्या

भरत को उपेक्षित नज़रों से देख रही थी,

भरत के लिए तनिक भी आसान नहीं था

अयोध्या का राजा बन जाना !

और ऐसी विषम परिस्थिति की जिम्मेदार

माता कैकेई हुईं

लज्जा तो आनी ही थी भरत को ।

उसके चित्रकूट आने पर

लक्ष्मण का क्रोध -

जिसे शंका मान लिया गया,

उसके युवा मन के जबरन त्याग का परिणाम था ।

मेरी पादुका सिंहासन पर रख

भरत भी मांडवी से दूर रहा,

निश्चय ही इसीका दंड था

की चौदह वर्षों के बाद

कोशल लौटने पर

मैं भी

सीता से दूर हो गया

... हमेशा के लिए !

कर्म अपना हो

या जन्मदाताओं का _

अंतर क्या !

श्राप या वरदान _

फल तो भरना ही पड़ता है,

परिणाम की धधकती अग्निगुहा से

गुजरना ही पड़ता है।

_________

अर्जुन,

मेरी जन्मकथा का सार सुनो _

जब मां देवकी मुझे जन्म देने वाली थी

तब उसकी काया के भीतर

केवल मैं नहीं था,

मेरी अकाल मृत्यु के भय की छाया भी थी

बात ये और है कि

मेरी काया में समाई विष्णु की माया भी थी

उस भय के जाल को मैंने काटा




विश्वास की चादर बुनी

और अवतार का चोला पहने

मैं धरती पर आया

कारावास के बंद द्वार खुलने का जादू

द्वारपालों का गहरी नींद में जाना

अंधेरी काली रात

घनघोर वृष्टि

बाबा वासुदेव का

गोकुल जाने का साहसिक विकल्प

उफनती यमुना का मार्ग देना

और मेरे ऊपर शेषनाग का छत्र ...

ये सब नींव बने

केशव के विराट अस्तित्व की ।

मुझे मिली मां यशोदा

उसके वात्सल्य की घनी मरकती छांव !

बसा था जिसमें,

मां देवकी की ममता का पुखराजी गांव !

दो मांओं के उर का शीतल ताप ही

मेरी बाल लीलाओं के लिए वरदान

और मेरे युवा स्वरूप की शक्ति बना

मैंने पूतना का अंत

कालिया का मर्दन किया,

कदंब तले बंसी बजाई

श्यामा के तीर रास रचाई

बरसाने के रंग से

वृंदावन को सराबोर किया

अवतार में रहकर भी

अवतार से अलग होकर

अपने माधव को

छिछोरा माखनचोर किया ...

इन सबके मध्य

सात नवजात सहोदरों का वध

किसी क्षण

मेरे मानस से उतर नहीं पाया

गोधन गाते_गाते ही

अत्याचारी कंस के कुकृत्यों का

उत्तर लिखता गया

और काल बनकर छाया ...

अर्जुन,

तुमने तो संक्षेप में कथा सुनी

पर मेरा एक एक उत्तर विस्तार में था

यह सबकुछ यदि असाध्य नहीं

तो आसान भी नहीं था _

बात सिर्फ एक निश्चय की है,

एक लक्ष्य की है,

सोच लो

तो हर प्रश्न का समाधान होता है

और जो हल कर दे

उसी सिद्धार्थ, उसी वर्धमान,

उसी कान्हा के नाम के ललाट पर

एक शब्द_तिलक भगवान होता है।

_________

अर्जुन,

आगे की कथा सुन

मन के आगे

मन के विपरीत

प्रेम की कालिंदी को पार करके

मैं _ हरि

गोकुल, ब्रजवीथियों और बरसाने को त्याग

मथुरा चला गया।

मन के एक भाग में हाहाकार भरा था

पर उसी मन का दूसरा भाग

पहली बार

जन्मदायिनी के उर से लगने की

अपूर्व अनुभूति से

आषाढ़ की बरखा से सिक्त धरा की तरह

आह्लादित था, हराभरा था

और इनके मध्य

मुझे मेरे ही द्वारा गढ़े गए कर्तव्यों का

निर्वाह करना था ...

यह सब

किसी अग्निपरीक्षा से गुजरने जैसा था

किंतु किसी को भी

मेरा विवश रूप नहीं दिखा

क्योंकि मैं देवकी की आठवीं संतान था

विष्णु का अवतार था,

पूतना और कालिया का संहारक था,

गोवर्धन का धारक था

कृष्ण और पीड़ा !

भला कैसे ?

कालांतर ......

मैं द्वारकाधीश बना

और तथाकथित किंवदंतियों का केंद्र भी

मेरी उंगलियों में

हरित बांस की बांसुरी की जगह

सुदर्शन अा बसा

जिसे चलाना था

जिसे चलाते हुए मैंने देखा

आतताइयों के मस्तक ही छिन्न नहीं हुए

मेरी अनुराग_नदी भी छिन्नमस्तिका हुई

मेरी रासलीला भी खंडित हुई

मेरा मधुबन भी क्षत विक्षत हुआ

पर देखा किसने ?

किसने जाना ?

यदि इन प्रश्नों के चक्रव्यूह में

मैं स्वयं को छोड़ देता

तो आज तुम्हारे निकट

तुम्हारा सारथी बन

रणछोड़ की संज्ञा नहीं पाता,

बिना अस्त्र शस्त्र को हाथ लगाए

महाभारत की विजय तक

तुम्हें कैसे खींचकर लाता !

इसी में तुम देखते हो ना,

मेरा विराट रूप !

मत्स्यवेध के समय,

मछली की आंख पर,

दृष्टि टिकाने वाले कौंतेय !

एक प्रश्न है तुमसे _

मेरे विराट रूप में

तुम्हें माखनचोर दिखा ?

जोगीरा गाता गोविंदा दिखा ?

या मुरलीधर या सांवरा ?

कारागार में पड़ी मां देवकी ?

यमुना पार करते पिता वासुदेव ?

मेरा पालना झुलाती मेरी यशोदा मइया

उलाहनों पर कान न देते मेरे नंद बाबा

मेरे साथ खेलते मेरे बलदाऊ बीर

मेरे बालसखा, मेरी गोपियां,

और जिसके होने से मैं हूं

मेरी राधा ?

यदि देखा है

तो हर द्वंद्व की कारा तोड़कर बाहर आओ

यहां से जो राह निकलती है

वही गंतव्य तक लेकर जाती है

द्वंद्व निर्बल करता है

अपने द्वंद्व के मोहपाश

निर्ममता के साथ

यदि मैंने नहीं काटे होते

तो मैं होता अवश्य

मगर कृष्ण नहीं होता

फिर क्या होता !

न होता द्वारकाधाम, न होता हस्तिनापुर

न गोकुल, वृंदावन की प्रतिष्ठा होती

न मुरली की धुन राज करती

न कभी होती धर्म की स्थापना

और न होता _

घृणा, द्वेष से भरी इस धरती पर

शाश्वत अस्तित्व

राधामाधव के रहस्यमय

गौर सलोने

प्रेम का।

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By Rashmi Prabha







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