सुनहरी
By Inder Raheja
एक ख्वाइश की खातिर जिसकी, आसमां के सब तारे गिर गए।
जिसके आंचल के साए में सोके अंधेरे से हुई यारी ऐसी, जुगनू सब पहचान के बन गए।
कांटो ने पकड़ा आंचल उसका, तो तमाम गुलाब शर्म से झुक गए।
आंखो से टपकी बूंद ढूंढने , नालायक हंस सब मोती बिन गए।
जिन मोरो के संग नाची थी वो आशिकों के पैगंबर बन गए।
नकल उतारती थी उसकी सब, खुद तितली बोली जब मुकदमे चल गए।
सुनके मिट्टी से कदमों की आहट जिसकी , घुंघरू पायल सन्नाटो में बस गए।
चेहरे पे ऐसी रौनक थी के चांद के बाजू साए बन गए।
गलती से भी नजर मिली तो, लगा महखाने के रस्ते मिल गए।
स्पर्श में उसके गर्मी इतनी छुआ था जिन एहसासों से, सारे के सारे गल गए।
एक बार जो देखा अदा से भर के, शीशे भी झांसे में फस गए।
देख के ऐसी हालत मेरी परवाने मोम से पीछे हट गए।
हम तस्वीर क्या लेके बैठे उसकी उधर ताजमहल पे ताले पड़ गए।
दो बात आज क्या करदी उसकी लाखो के लो कागज़ खप गए।
ये पहली बारिश की तो महक नही है, झूठ पकड़ ले झोंके का इतने तो हम माहिर बन गए।
By Inder Raheja

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