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सुक्खी लाला! मेरे बच्चे भूखे हैं। - By Yugmahalaya (pen name) Sandeep Kumar Singh

Aug 13
5 min read

Written By: Yugmahalaya ( pen name) Sandeep Kumar singh

Category: Poetry

Competition: Global Poetry and Creative Writing Competition 2026

In the heart of the Global Poetry and Creative Writing Competition 2026, Yugmahalaya (pen name) Sandeep Kumar Singh brings forth a deeply resonant piece titled "सुक्खी लाला! मेरे बच्चे भूखे हैं।" This evocative entry, belonging to the poetry category, profoundly explores themes of human struggle and societal disparities. With its raw emotional depth, the poem sheds light on the harsh realities faced by individuals in their day-to-day lives. Through his work, Yugmahalaya invites the audience to delve into a world where the mundane intersects with the profound.

About the Work

"सुक्खी लाला! मेरे बच्चे भूखे हैं।" is a powerful exploration of societal and economic challenges that many face. The poem's tone is both somber and reflective, painting vivid images of struggle and endurance. Yugmahalaya uses striking literary techniques to convey emotions that resonate deeply with the reader. Through metaphor and symbolism, the poem addresses the harsh truths and inherent struggles of life, making it a poignant commentary on societal issues.

सुक्खी लाला ! मेरे बच्चे भूखे हैं।

Original Submission by Yugmahalaya ( pen name) Sandeep Kumar singh

.सुक्खीलाला! मेरे बच्चे भूखे हैं।

छि:!

एक अदना सा आदमी!

जो अदना है, आज भी,

इतना ताव खाए?

जेब में सिक्के खनखनाए,

और वो ,

झोला उठा कर बाजार जाए?

ईश्वर !

हे ईश्वर!

पैरों में और कितने गह्वर?

अपमानित बाजार जाए?

अपमान खरीद घर लाए?

देखो ,देखो झोले में,जरा क्या है?

एक बंद मुट्ठी का बयाँ है।

चेहरे पर लिखा मनुष्य नहीं,

आँखों से जीवन अदृश्य कहीं।

सारे के सारे मौसम रूठे हैं।

आँखों में लिख ,चल दिए,

अबकी बादलों के संवाद ही सूखे हैं।

“सुक्खी लाला ! मेरे बच्चे भूखे हैं”।

आदमी बाजार से, ये खरीद लाया?

इतना धन कहाँ से आया?

चूल्हे के पीले बसंत पर इसको चिपकाया।

कालिदास!

मत चौंको!

सृजन और साहित्य के,

वन,कानन ठूँठे हैं।

उसकी पीत काया पर,

स्वर्णिम आभा के धोखे हैं।

वीणा के वाणी- विग्रह,

शारदा से छूटे हैं।

“सुक्खीलाला! मेरे बच्चे भूखे हैं “।

इस क्रंदन की अभिव्यक्ति में,

ईश्वर ने मार्मिक प्रसंग पाया।

आसन छोड़, वेदना में चिल्लाया,

“रुको, मनुष्य, अरे! रुको।

न मनुष्य के समक्ष इतना झुको”।

पर झुका था वो, कमान सा,

वो लाश, बिन मसान था।

प्राण की प्रतिष्ठा के प्रण सारे जूठे हैं।

ईश्वर!

तेरे प्रसाद के महात्म्य,सारे झूठे हैं।

“सुक्खीलाला! मेरे बच्चे भूखे हैं”।

कौन रोक लेता है,

आदमी के इस बसंत को?

कौन मार डाले हैं,

विश्वास में दिगंत को?

पटकथा में लिख दिया,

आरंभ में ही अंत को?

अंत के स्वभाव में,

दिखा रहा अनंत को?

है वेदना से क्लांत जो,

है शांत, पर अशांत जो,

भव्य उन प्रासादों में ,

काढ़े बेल-बूटे हैं।

बनाए राजमार्ग,

जिसने, पैर आज टूटे हैं।

मंदिरों में छिप कर, ईश्वर,

उनके भय से बैठे हैं,

प्रार्थना में मंत्र, ये स्वतंत्र ,

और अनोखे हैं।

“सुक्खी लाला! मेरे बच्चे भूखे हैं”।

कालिदास!

शंकुतला को प्रेम का,

इतना झीना आवरण क्यों पहनाया?

संस्कृत को सौंदर्य की ही विषय-वस्तु क्यों बनाया?

देखा नहीं तुमने?

मत्स्य-क्षुधा में,दुष्यंत का प्रेम जा समाया।

तुम्हीं ने बताया,

द्रव्य के अभाव में प्रेम- सुधा सूखे है।

लिखो!

फिर लिखो।

एक महाग्रंथ, उनके लिए,

जो श्रृंगार से अछूते हैं,

दुष्यंत के विस्मृत प्रेम से रूखे हैं।

“सुक्खी लाला! मेरे बच्चे भूखे हैं”।

बात फैलती गई।

समय को लीलती गई।

आदमी के झोले को,

सूई लीपती गई।

सूई में भी छेद था,

काना-काना खेद था।

बात आखिर चू गई।

चू के चाल बन गई।

रेंगती चढ़ी वितान,

व्याल-भाल बन गई।

विभिन्न पायदान पर,

छोड़ती निशान, पर,

शीश पे वो चढ़ गई।

नवीनतम शिखर,

पतन के,

शीर्ष पे वो गढ़ गई।

वेणी में कलम ने अब,

सर्प-दोष गूँथे हैं,

विषधरों के भाग्य जागे,

नए पंख फूटे हैं,

“सुक्खीलाला! मेरे बच्चे भूखे हैं”।

हर्ष में,

विषाद में,

वासना,प्रमाद में।

विक्षिप्त आह्लाद में,

शक्ति के अगाध में।

राजप्रासाद से,

क्षोभ की मवाद से,

और,और गाद से,

प्रलय के संवाद से।

मकान से,

दुकान से,

विजन शमशान से,

योग-भोग, ध्यान से,

मनुष्य के प्रमाण से।

हैं सर्प-दंश प्रस्फुरित,

नव-पल्लवों में अंकुरित,

नए हैं ईश अवतरित।

आँत भी ,

दाँत भी।

पिशाचिनी रात भी,

पिशाच ही प्रभात भी।

धर्म की जमात भी,

और जात-पात भी।

एक शाक तृ्प्त कर दे?

ऐसे कृष्ण झूठे हैं।

लाओ, लाओ, और लाओ,

शर्करा के चींटें हैं

भूख के हैं अंकपाश,

वासना के छींटें हैं।

हाट घाट-घाट हैं,

जोहते बाट हैं।

नित नगाड़े पीटे हैं,

तौल के सुभीते हैं।

“सुक्खीलाला! मेरे बच्चे भूखे हैं”।

गेंहू हैं हुए उच्छिन्ने,

मधुमेह से पीड़ित गन्ने।

हो गई धान को पथरी,

दालों की फटी है कथरी।

खेत बने मुँहझौसा,

पानी ने घात परोसा।

मिट्टी हो गई है हौआ,

बस,खड़ा एक कनकौआ।

कनकौआ किसे डराए?

चिड़िया उड़ के तो आए !

बागों में भूत हैं फूले,

हैं प्रेम से झूले ,झूले।

परदेस से लाते खाना,

अब खाना यही बनाना।

देसी चक्की भूके है,

“सुक्खीलाला ! मेरे बच्चे भूखे हैं”।

अरे! कौन है सुक्खीलाला?

सुख इतना किसने है पाला?

नहीं! नहीं! ईश्वर वो नहीं,

ईश्वर भी उसके दर पे वहीं।

ईश्वर भी हो मतवाला,

है ढूँढे सुक्खीलाला।

दस रूप में ईश्वर कर न सका,

संसार की नाड़ी धर न सका।

अपना ही भार उठा ,उसने,

अपनी रचना के सिर डाला।

संसार की चक्की छूट गई,

चूल्हों का पिटा दीवाला,

तब आए सुक्खीलाला।

ईश्वर ! तुमसे न होगा,

लाओ दो, कुंजी-ताला।

व्यापार बना सुक्खीलाला,

बाजार बना सुक्खीलाला,

खेतों में ,बागों में,सुक्खी,

घर-बार बना सुक्खीलाला।

जूठी देहों का महाभोज,

मोक्ष दिलाती मधुशाला।

झुके, समर्पित शीशों की,

आशीष बना सुक्खीलाला।

सब बिछे हैं उसके पैरों पर,

बख्शीश बना सुक्खीलाला।

है श्राप वही, वरदान वही,

हम सबका है भगवान, वही।

धरती की देह है छील रहा,

आकाश खड़े ही लील रहा,

शिक्षा को भिक्षा कर डाला,

दोहन को दीक्षा पर डाला।

माया के शब्दकोश में है,

बस, एक अर्थ, सुक्खीलाला।

हैं अविजित रहे किले जिसके,

वो महागर्त , सुक्खीलाला।

मृत्युलोक में जीने की,

बस, एक शर्त, सुक्खीलाला।

सच से सब आँखें मींचे हैं,

कोई आगे है,कोई पीछे है।

उसकी मूँछो पर ताव है बस,

संसार की मूँछें नीचे हैं।

उठ, कौन खड़ा हो आगे उसके,

भगवान भी जिसके पीछे हैं।

हँसता वो करुण विलापों पर,

ग़दग़द, विक्षिप्त प्रलापों पर।

सुक्खी लाला की जय बोलो

संसार कहे, “मुट्ठी खोलो”।

वो अपनी मुट्ठी भींचे है।

है मंत्र यही, है तंत्र यही,

सब मिथक, शब्द में सच्चे हैं

“सुक्खीलाला ! मेरे बच्चे भूखे हैं”।

About the Competition

The Global Poetry and Creative Writing Competition 2026, hosted by Hashtag Kalakar, is a prestigious platform celebrating the art of words. It aims to bring together poets and writers from around the globe, fostering a community that values creative expression. Participants are encouraged to submit their finest works, contributing to a diverse tapestry of literary art that highlights the universal power of storytelling.

We extend our heartfelt gratitude to Yugmahalaya (pen name) Sandeep Kumar Singh for sharing his profound poem, "सुक्खी लाला! मेरे बच्चे भूखे हैं," with us in the Global Poetry and Creative Writing Competition 2026. His contribution enriches the competition and offers deep insight into the struggles faced by many. Thank you for your poignant expression and dedication to the craft of poetry.

About Hashtag Kalakar

Hashtag Kalakar is a creative platform dedicated to providing artists, writers, singers and other creative talents with opportunities to showcase their work and reach wider audiences through competitions, features and creative initiatives.

 
 
 

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