सुकून
By Dr. Shahina Praveen
तेरे मेरे जीवन का आधार
कोई सुने, समझे, करे स्वीकार
लिए चाह मोहब्बत, अपनापन की
दर दर भटकते बेचैन, बेक़रार।
चुनौती भरा ये डगर अंजान
कसौटी करे पल पल इस्तकबाल
कितना कुछ सहता ये दिल नागवार
बावरा मन करता सुकून की तलाश।
दर्द, टीस, हादसा, अपमान
होती हैं अक्सर गिनी चुनी बार
हो कर हम कल्पनाओं पे सवार
दुहराते ख़ुद संग अनगिनत बार।
इस बात की तुम रखो अहतयात
उलझने हों केवल दायरे के पार
उसमे तुम दो न बिलकुल साथ
सुकून से करो मुश्किलों को आसान।
By Dr. Shahina Praveen

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