सिहरन
By Jyoti Singh
इस बार,
बड़ी कड़ाके की ठंड है
ख़ुद को गर्म कपड़ों में लपेटे हुए,
वह घर से बाहर निकलती है
कांपते हाथों के साथ,
उस गली की ओर,
वह धीरे - धीरे बढ़ती है
वह गली,
जो इंतज़ार करती है उसका,
हर दिन
कुछ ठंड के साथ,
कुछ लोगों के साथ
जिनकी तीखी नज़रें,
और चीरती हंसी,
उसे अंदर तक डरा देती हैं
इस ठंड में भी,
उसे पसीने से भिगा देती हैं
हां ! वही चुपचाप गली
जो हर मोहल्ले में है
जो कुछ बोलती नहीं,
जो शांत है, सुनसान है
जहां कोई शोर नहीं है,
बस.......सिहरन है ||
By Jyoti Singh

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