सिपाही हूँ
By Astha Priyadarshini
किसी का दोस्त हूँ,
तो किसी का दुश्मन हूँ,
कभी इस पार हूँ,
तो कभी उस पार हूँ,
सिपाही हूँ।
जान लुटाता हूँ, और खुद को भी,
देश की खातिर, है छोड़ा घर भी,
कभी तिरंगे से लिपटा जाता,
कभी देश के लिए,(देश से) बेदख़ल भी होता,
ना सवाल और ना ही जवाब,
ना देश की उलझन और ना सुकून हूँ ,
सिपाही हूँ।
कुछ रिश्ते मेरे घर-गाँव के-
जिनकी याद की फ़रियाद भी
मुश्किल से जीता हूँ ,
मिलने की उम्मीद भी त्याग दी,
और प्यार को भी छोर दिया,
अक़्सर तनहा सा,
घर होते हुए भी आवारों सा,
घर जाता नहीं, पर बचाता हूँ,
सिपाही हूँ, पर घर मेरा भी है।
By Astha Priyadarshini

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