सिंहपर्णी का बीज
Updated: Dec 3, 2022
By Sudhanshu D'Souza
ऊँचे आकाश में बादलों के बीच
किसी पर्वत के माथे पर स्थित
एक देवी झाँकती है भूमि पर
जहाँ सारे जीव हैं उससे निर्मित
सिंहपर्णी का फल भूमि पर
देख रहा था पवन की राह
बीज थे उसको कईं छुड़ाने
वायुदेव को किया आगाह
झोंका भेजा गया हवा का
सारे बीज गए इधर-उधर
कोई गया किसी बागीचे में
तो कोई घूमा अंजाने घर
एक बीज ऐसा भी था
धरती के लिए जो बना नहीं
उसकी उड़ान की राह अलग थी
ऊपर की ओर वह चला कहीं
बादलों में बैठी देवी ने
हाथ बढ़ाया उसकी ओर
पहुँचने इतना ऊँचा बीज ने
खूब लगाया था पर ज़ोर
हाथ पार करके देवी का
आसमान को उसने चीरा
कल्पवृक्ष को देखा उसने
बादलों का छाया फिर घेरा
आँधियों-सी आई बौछार
जनने लगी हवाएँ एक बवंडर
तूफ़ान छा गया था नभ में जो
आने लगा अब था भूमि पर
मेघा बरसी चारों ओर
ज़मीन में कुछ तिनका-सा धँस गया
हवाएँ अचानक रुक-सी गईं
तूफ़ान ने था एक बीज बोया
By Sudhanshu D'Souza

Comments