सास को चिट्ठी...
By Dr. Suboohi Jafar
जब मेरा जनम हुआ, तब माँ ने गले लगाया था,
जब विवाह के समय बहू के रूप में दूसरा जनम हुआ, तो आशा थी की सासु माँ भी सीने से लगाएगी,
खट्टे मीठे संसार का सपना आँखों में बुने, मैं ससुराल आई थी|
सोचा था, वहाँ भी माँ का प्यार मिलेगा,
देवर के रूप में छोटे भाई का सानिध्य मिलेगा,
ननद के रूप में नन्हीं सखी मिलेगी,
और पति से असीम प्यार और इज़्ज़त मिलेगी|
लेकिन ऐसा कुछ न हुआ, सपने सारे चकनाचूर हुए,
आपकी शिकायतों का पिटारा खुला, दिल में मेरे नासूर हुए,
सोचा चुप रहती हूँ, एक न एक दिन आपके दिल में जगह बना ही लूँगी,
आख़िर आप भी माँ हैं, कब तक नाराज़ रहेंगी|
उम्मीद थी, कि कम से कम पति तो मेरी चुप्पी समझेंगे,
मेरे भीतर छुपी हुई, प्यार की मूरत को कभी तो पहचानेंगे,
इसी सब उठा पटख में वो दिन भी आ गया,
जब मेरे गर्भवती होने का समाचार डॉक्टर ने दिया|
लगा, कि चलो, अब तो हालात सुधर ही जाएंगे,
पोता/ पोती के आने की ख़ुशी में सब मग्न हो जाएंगे,
लेकिन इसका बिलकुल उलट हुआ,
आपके मन में जायदाद जाने का डर हुआ|
मैं भी कमाती थी, पैसों का मुझे कोई मोह न था,
लेकिन आपके ह्रदय का डर, इस बात को पहचान न सका,
पति को आपने समझा- बुझा कर मुझसे और बेटे से दूर कर दिया,
ये कह कर कि मैं घमण्डी हूँ, मुझे बेटे के साथ घर से निकाल दिया|
आपने तोड़ दिया, अपना ही परिवार, हरा- भरा,
इतने पर भी आपका मन नहीं भरा,
इन सबका दोष भी आपने मेरे सिर मढ़ा,
और अपने मन से मेरी बुराइयों का महल गढ़ा|
बहुत कोशिश की मैंने, सब कुछ सुलझाने की,
बीती बातों को भुला कर, इक नई शुरुआत करने की,
लेकिन आपकी तो मंशा ही कुछ और थी,
मैं और मेरा बेटा, आपकी आँखों की किरकिरी थे|
ठीक है, मान लिया मैंने नियति का खेल,
बढ़ गई मैं आगे, छोड़ दिया आपका द्वार,
आज मैं खुश हूँ अपने बेटे के साथ,
बसा लिया मैंने अपना आशियाँ, हूँ मैं आत्मनिर्भर|
लेकिन कुछ भी कह लो, दिल का एक कोना आज भी ख़ाली है,
रह गई कसक ये दिल में, कि इन सबमें मेरी क्या ग़लती है,
कितना अच्छा होता, अगर आप मुझे अपना पातीं,
रहतेसभीसाथमिलजुलकर, खुशियाँहमारेभीघरआतीं|
By Dr. Suboohi Jafar

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