साँसों से सपने
By Bhagyashri Babanrao Ghuge
मोहताज है ज़िंदगी मेरी मेरे सपनों पर
क्योंकि हर सपना साँसों को जोड़ कर बनाया है ।
साँसों को मौत के अलावा रोके भी कौन?
लेकिन एक हलका-सा वार आज मेरे सपनों को तोड़ पाया है ।
'सपना' - मेरी सांसों से बुना हुआ एक पिटारा,
आज एक हलके से तूफान ने हर उस साँस को अलग कहीं बहाया है ।
ऐसा लगता है,मानो मौत के आँचल में ज़िंदगी तड़पती हुई उन्हीं साँसों के लिए जिसे कहीं खो दिया है ।
कहते हैं कोशिश में शिद्दत हो तो खुदा भी अपने बंदे से मिलने आया है
इसलिए शायद खोई हुई ना सही लेकिन नई साँसें देकर, मौत के आँचल से बचाया है ।
नई साँसों से नए सपने बूंद कर अब फिर से , लड़खड़ाते हुए कदमों को बढ़ाया है ।
तभी वक्त ने कहा मुझसे, तेरी नई ज़िंदगी के संग मैंने हाथ थाम लिया है ।
इस बार बशर्ते सपनों को मज़बूती से थामा है क्योंकि यहीं फिर से जीने का मकसद लाया है ।
मगर उस हलके से वार की चुभन ने इस नई ज़िंदगी से हमेशा यही सवाल किया है
कि आखिर क्यों मैंने डगमगाहट होने पर अपने सपनों को कफ़न पहनाया है?
और क्यों इस छोटी चुभन पर किश्तों मेंअपने सपनों को दफ़नाया है ?
By Bhagyashri Babanrao Ghuge

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