सरहद पर के हिन्दू
By Abhishek Kumar 'Shahi'
तुम्हारे असीमित संघर्षों को आखिर एक आज़ाद स्वर मिला।
लड़े हम भी संग तुम्हारे तिमिर से पर ईनाम में गह्वर मिला।।
क्या स्वर्णिम सपने थे आजाद आसमाँ के जब थे कैद गोरों के शिकंजों में।
कहाँ मालूम था होकर आज़ाद कफ़स से फंस जाएंगे खूनी बाज पंजों में।।
कहाँ मालूम था खींच लकीरें शरहद की भारत इतना बेगाना हो जाएगा।
जहां भगतसिंह फांसी झूला वो लाहौर हमारा कत्लखाना हो जाएगा।।
आज़ादी की बलि वेदी पर चढ़ा मष्तक अपना प्रसून दिया।
सुभाष के ओजस्वी आह्वान पे हमने भी अपना खून दिया।।
कुर्बानी की तस्वीरों में देखो हमारी भी परछाईं है।
हमने भी लाजपत संग लाहौर में लाठियां खाई है।
फिर बोलो ऐसा था क्या खोट हमारी करनी में?
जो छोड़ दिया हमें सदा के लिए इस वैतरणी में।।
तेरे घर दीवाली दीप जले मेरे घर देखो अँधेरा है।
बिना सिंध के तो तेरा "जन गण मन "भी अधूरा है।।
कर लहरें चीत्कार कहती रही बार -बार मैं सप्तसिंधु हूँ।
थोड़ा विकल हो मेरी व्यथा में तुम ,मैं सरहद पार का हिंदू हूँ।।
दुष्कर्म , दमन और दुराचार , देखता रहा बैठ मैं लाचार।
मर्यादा का मानमर्दन देखा , देखा अपनों का भीषण संहार।।
धरातल पाँव न छूए होंगे जिनके लगाया उन सुकुमारियो का बाज़ार।
कीमत लगा-लगा कर हुआ नारी स्मिता का बेशर्म व्यापार ।।
यज्ञ-हवन सब अवरुद्ध हुआ , हराम भजन-कीर्तन हुआ।
बच्चों के गर्दन पर छुरी रख बाप का धर्म परिवर्तन हुआ।।
काग-श्रृगाल ही कह सकते है खूनी कितना दामन हुआ।
जिसने भी इंकार किया सुना वो आंगन हुआ।।
बहकर अश्रु सूख गए सारे नयन अब बंजर हुआ।
रुद्राभिषेक के इंतज़ार में शिवालय खंडहर हुआ।।
पर इन खबरों से बेखबर जैसे सुर्खियाँ सारी गौण रही।
सत्ता से मतलब था मिल गया ये जानकर दिल्ली मौन रही।।
सुना ,डरकर गोरे भागे देश छोड़ जब उन्होंने अहिंसक आग्रह किया।
फिर क्यों गाँधी हमारी खातिर न अनशन किया न सत्याग्रह किया।।
कह दो चीखकर सारी दुनिया को कि तुम्हारे अपने नहीं हैं हम।
हमने भी क्रांति का अखबार लिखा था नाम था जिसका वंदे मातरं।
सिंधु तट पे सूर्योदय की आशा देखता मैं तेरा बंधु हुं।
थोड़ा विकल हो मेरी व्यथा में तुम ,मैं सरहद पार का हिंदू हूँ।।
वो सदियों के तप का मंत्रोचार ,वो श्रीकृष्ण की गीता का सार।
वो सिंधु घाटी की सभ्यता , वो मर्यादापुरुषोत्तम राम का संस्कार।।
वो गुरु गोविंद सिंह की कुर्बानी , वो नानकदेव की गुरुवाणी।
वो कबीरा की कटाक्ष वाणी, वो मीरा कृष्ण की दीवानी।।
कहते ये सब आडंबर है , अब तुम्हारा एक नया पैगम्बर है।
मैं शौक से सजदा कर लूंगा इतना जोर न जालिम आज़माओ।
मेरी गर्दन पर छुरी रखने वाले पहले खुद मुसलमान बन जाओ।।
हम गैर-महजब से है शायद इसलिए कहते तुम गुनहगार हैं।
फिर अहमदिया ,बलोच ,सूफी ,सिया वो किस जुर्म में कसूरवार हैं!!
और वो लाखों बेकसूर बंगाली , क्यों मौत के मेहमान थे।
उर्दू ज़बान भले न थी , पर वो तो सारे मुसलमान थे।।
मौत यहाँ का मज़हब है , हर दिन नई साजिशें , नया फ़रेब।
जैसे इतिहास के पन्नों से आ गया हो उठकर औरंगजेब।।
अपने सत्ता स्वार्थ में तुमने कैसा क्लेश दे दिया ।
किन जाहिलों के हाथों में तुमने ये देश दे दिया।।
कभी चाँद का हिस्सा था , अब अवशेष सिर्फ चंद्रबिंदु हुं।
थोड़ा विकल हो मेरी व्यथा में तूम् ,मैं सरहद पार का हिंदू हूँ।।।
By Abhishek Kumar 'Shahi'

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