सम्भोग
By Raj Modi
अभी तो सूरज ठीक से आया नही था
खिड़की के सामने लगे परदे से २ बीम उजाले की मात्र
वो भी टूटता हुआ, क्युकी सामने तुम खड़ी थी
निर्वस्त्र, भाव, विचार
तुम ही सोचो, मेरी आंखे खुलती है और सामने ये चित्र
विंसेंट की स्टारी नाइट के बाद की सुबह प्रतीत होती है
मेरे आसपास कितना शोर है,
सुबह काम पे जाने वाले लोग, गाड़ियों की आवाज़
कही सामने, घर के किचन से बर्तनों की आवाज़
दाई और चार्ज में रखे फोन से बाज रहे अलार्म की आवाज़
शुक्र है इस शहर में पक्षियों का शोर नही,
इतनी आवाज़ के बावजूद सबकुच अपने आप शांत होता है
तुम्हारी सांसों की आवाज़ बस, ऐसा लगता है मेरे कान
एक ही फ्रीक्वेंसी सुन पाते है, मैंने धीरे से कंबल हटाया।
पाया में भी निर्वस्त्र, निर्भाव, निर्विचार
तुम्हारी और अपने आप खींचा चला आया
तुम्हारे होंठो से मेरे होंठ की दूरी कम से कम हो रही है
कौनसा एकम है पता नही, पर
पांच
सब कुछ धीरे हो रहा है
चार
सोचने की क्षमता कम हो रही है पर
समय बढ़ता जा रहा है
तीन
अभी कोई विचार नहीं आ रहे है
बस वही विचार खींच रहे है
बार बार एक ही चीज़ सोच रहा हु
दो
अब?
खाली हो गया दिमाग, देखा फिर से वही बात
इतना खाली अपने आप को कभी महसूस नही किया
कुछ ना करना, सोचना, निर्भाव, निर्विचार होना
इतना आसान था पता नही था, और ऐसा लगता है की...
एक।।।।
By Raj Modi

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