सम्भाल
By Kavita Batra
हां मे जिम्मेदार बेटी रही हुं, अपने पिता के आंगन की ।
नहीं था कोई भाई , पर तीन बहनों में थी मैं बेटा जैसी , अपने पिता के आंगन की ।
हर लम्हे में सम्भाल लेती थी ,रिश्ते क्या, चीजें क्या जिम्मेदार बेटी थी अपने पिता के आंगन की ।
ऊमर का जोर था तो शादी हुई, बच्चा आया , बेटी से बहू , और फिर मां , जिम्मेदार बेटी थी अपने पिता के आंगन की ।
सम्भाले कि फितरत जो पिता के आंगन से थी, वो मेरे साथ हर पडाव पर रही |
संभालते संभालते कितनो को , मैं अपने आप को कहीं खौ सी गई, थक सी गई,
एक पल को जब रोका अपना कारवान तो पाया कि मुझको सम्भाल ने वाला कोई नहीं।
जिम्मेदार बेटी थी , बेटे जेसी , अपने पिता के आंगन की ।
By Kavita Batra

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