-समय, समाज और मैं !-
Updated: Jul 28, 2025
By Sakshi Joshi
क्या इस मे जी रहा हूँ मैं?
क्या इसकी जरूरत है मुझे?
जब-जब इसके लिए लड़ा मैं,
तब-तब ठोकर मुझे मिली है!
जिसकों परिवार माना,
जिसकी तरक्की चाही,
पर समय आने पर पता चला की,
अपना तो अपना होता है,
समाज की तरक्की तो,
सिर्फ सपना होता है!
समय ने चक्र ऐसा घुमाया,
अपने पराये में फरक बताया!
और ये भी समझाया की,
अपने बुरे वक्त में कोई,
कभी काम नहीं आया!!
जिसको पैरों में था बैठाया,
उसने पैरों में ही स्वर्ग सजाया!
जिसको कभी पराया माना,
उसनें तो हमें अपना भगवान बताया!!
जिसको जिम्मेदारी समज के निभाया,
आज उस जिम्मेदारी का बड़ा ही मीठा फल है आया!
इस मीठे फल ने कल की,
कड़वाहट को भी भुलाया!!
जिस समाज के नाम पे मैंने
गर्व है बताया,
अब याद है आया की,
कड़वा फल भी था इसी ने
खिलाया!
आज जाकर ये है समझ आया की,
समाज को पीछे छोड़ क्यूँकी,
ये तो है बस एक झूठा साया,
और आगे बढ़ता जा,
तेरा अच्छा समय है आया!!
By Sakshi Joshi

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