समन्दर की लहरें
By Kumudini S Tomar
ये समन्दर की लहरें
बार बार मेरे पास आ रही हैं
कुछ कहना चाहती हैं शायद
कुछ अनकही बातें
बरसों से सम्हाल कर राखी हैं
अपने मन में
कहने से डरती हैं शायद ....
कहीं ये मेरी माँ तो नहीं
जो अचानक दूर हो गयी मुझसे
न चाहते हुए भी
मुझे अपने आँचल में
समेटना चाहती होंगी
मन भर गले भी नहीं लगा पाई
और दूर हो गयी ............
कहीं पुरानी सखी तो नहीं
बचपन जीना चाहती होंगी
मेरा हाथ पकड़कर
खेलना चाहती होंगी
आँख मिचोली
गुडिया की शादी ........
कहीं ये लहरें दादी के गाँव की नदी से
तो नहीं आ रही
अपने वात्सल्य से हमें भिगोना चाहती होंगी .......
ये समंदर की लहरें
मेरे मन की अधूरी ख्वाहिशें होंगी शायद
कुछ जो बचपन में पूरी न हो पाई
कुछ जो तरुनाई में अधूरी रह गयी होंगी......
लेकिन जब आज यहाँ बैठकर देख रही हूँ ...
लहरों की मीठी कल कल सुन रही हूँ
लग रहा है धीरज दिला रही हैं ..
कि पगली कभी किसी की हर ख्वाहिश
पूरी हुई है आज तक ....भला
कुछ चीजें थोड़ी अधूरी ही अच्छी लगती हैं ...
मुझे लहरा कर ,इतरा कर दिलासा दे रहीं हैं .....
सब अच्छा होगा .....
जैसे मैं किनारों से मिलकर
संतुष्ट हो जाती हूँ
सब पूरा सा लगता है .
By Kumudini S Tomar

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