सबा- एक अनंत गाथा
By Bhavya Chhabra
सबा,
मैं तुझपर इक किताब लिखूंगा
मगर उसका अंत नही लिखूंगा
मैं तुझे त्रेता में लिखूंगा
जब सीता के रूप में था मैंने तुझे पाया
बड़े ही यत्न से तुझे अपनी अर्धांगिनी था बनाया
मगर समाज ने तेरा मेरा साथ ठुकराया
समां गयीं विलीन हो गयी तुम धरती में
बिछड़ने का वक़्त था आया
मैं तुझे द्वापर में लिखूंगा
राधा बनकर तू मेरी ज़िन्दगी में
और कृष्ण बनकर मैं तेरी ज़िन्दगी में था आया
सच्चे प्रेम की परिभाषा को था बदला
और
खूब रंग रास रचाया
मगर काल ने फिर अपना चक्र चलाया
तुझसे आखिरी मुलाक़ात के वक़्त
आखिरी बार मैंने बांसुरी को मुख से था लगाया
छीन लिया मैंने दुनिया से संगीत सुनने व सुनाने का हक़
राधे,
तेरे जाने के बाद कुल संसार में कोई गीत न गा पाया
मैं तुझे कलियुग में लिखूंगा
एक बार नही बार बार लिखूंगा
तुझे दरख्त में लिखूंगा
और उससे गिरकर बिछड़ जाए जो पतझड़ में
खुद को उन् पत्तों में लिखूंगा
मेरे हाथ से फिसलती जाए जो
तुझे उस रेत के हर ज़र्रे में लिखूंगा
तुझे लैला
और खुद को क़ैस लिखूंगा
तुझे हीर
और खुद को राँझा लिखूंगा
तुझे सोहनी
और खुद को माहिवाल लिखूंगा
बटवारे में जो हुए थे जुदा
खुद को आज़ाद हिन्द का पंजाब
और तुझे आज़ाद पाक का मुल्तान लिखूंगा
आँखों में नमी
दिल में मोहब्बत
और ज़हन में लिए सूरत तेरी
खत लिखे थे तेरे नाम
उन खतों के जवाब का किया मैंने जो
तुझे वो इंतज़ार लिखूंगा
फिर जन्म लिया ये दुबारा
तुझे पाने को
तुझे पाकर इक दूजे में सिमट जाने को
अबके जो बिछड़े तो
तुझे आदिकाल में सती
और खुद को शिव का अवतार लिखूंगा
हो जाऊंगा शुन्य पर सवार
और तेरे इंतज़ार में
समस्त जगत का सार लिखूंगा
मैं तुझपर इक किताब लिखूंगा
मगर
By Bhavya Chhabra

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