सफलता और असफलता का संवाद
By Anubha Sinha
तू क्या संवाद करेगा मुझसे
मैं ठहरा विजय पुरुष का राजा
मेरे होने भर से ही
मनुष्य हो जाता, सब के आंखों का तारा|
हर्ष का ऐसा उन्माद "मैं" लाता
पराये भी बन जाते सगे-संबंधी
पिता का "मैं" शान बनता
माता का गौरव लाल
हर जिक्र में, मेरी ही बातें
चहों दिशा में, मेरी ही जय-जयकार
मिटाता मैं गरीबी की मार
लाता घर में लक्ष्मी की थाल
तू बता, कैसे करेगा
स्वयं को प्रमाणित आज
माना मैं असफलता हूं
नहीं कहीं पर चलता हूं
ना मेरा कोई मान, ना कोई सम्मान
पर तुम जो पहुंचता है
वो शुरुआत मुझी से करता है
मैं भी तपता कभी धूप से तो कभी भूख से
होठों पर रख सिसकियां हज़ार
आंखों को रोक कर रखता
हृदय के बवंडर में
और बंजर में अनुभव के वो बीज हूं बोता
जो बनता एक विशाल वृक्ष
जो हर त्रुटि को मंथन करता
तब जा कर वो तुम सा
सफलता का मीठा फल बनता
By Anubha Sinha

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