सफ़र ये ज़िन्दगी की
By Gaurav Mishra
अच्छा लगता था
वो हर रोज़ स्कूल जाना
छुट्टी लेने का जब
ना ढूंढते थे बहाना
कभी जो खुशियों का
ठिकाना ना होता था
आज वक़्त ढूंढते हैं
वो भी खुश होने का
ना वक़्त बदला है
ना ही बदले हैं हम
फिर ना जाने क्यों
किस बात का है ग़म
साथ कभी खुसी
बात कभी ग़म की
कुछ ऐसा है
सफ़र ये ज़िन्दगी की
By Gaurav Mishra

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