सन सैंतालीस की रात
By Bhavya Chhabra
सन सैंतालीस की वह रात थी
माहौल था जश्न का
मगर टुकड़ों में बंटा था घर मेरा
मिट्टी का रंग पड़ गया था लाल
और चाँद खून से सना था
स्वंत्रता की ौड़ में
खींच दी गयी थी सरहदें
धर्म के नाम जो हुआ बंटवारा
वो मेरे अखंड भारत का क़त्ल था
कुर्सी की लालसा में
तमाम सियासतदानो ने किया था जो
आज़ादी नहीं
वो मेरे अखंड भारत का क़त्ल था
By Bhavya Chhabra

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