सज़ा ए दिल्लगी
By Suvankar Dash
अक्सर रिश्ते इस मोड़ पे टूटते हैं
जब उम्मीदों से धोखे टकराते हैं
बेफिक्री की जगह तन्हाईयां लेती हैं
जब अल्फाज़ें आंसुओं का रूप लेती हैं
गज़ब है ये दिल और उसका अजीब सफ़र
नजाने कैसी कैसी हैं जिम्मेदारियां इस पर
ग़म के धागों से सीता रहा मगर
वो जो उसका आज है आनेवाले कल से बेखबर
ख़ाक के ढेर पे जैसे बिजली कड़की
राख़ हुए जल के एक आह भी न भड़की
ढोंग के बाज़ार में सच्चाई हुई नीलम
कोई हुआ गुमराह कोई हुआ सरेआम
हम सिर्फ तुम्हारे कभी न हो सके
एक पसंद से ज़्यादा कुछ न हो सके
मिले तो थे बिछड़ने के वादे पर
बिछड़ते बिछड़ते मिलने के वादा न कर सके
By Suvankar Dash

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