सच्चा आशिक़
By Paras Minhas
सच्चे आशिक़ की तौहीन, करके चले वो घर बसाने अपना।
घर बसा सब उजड़ गया, चले जिसे वो आशिक़ बनाने अपना॥
ये अपना-अपना कहकर तुमने ना जाने कितने दीवाने सवारे हैं,
फिर सज़ संवर-कर ख़ुद भी इतना न जाने कितने कवारे मारे हैं॥
सराफ़त का फिर पर्दा करके ख़ुदको बेहतर बताया है,
कहकर घर वालों को उम्दा ख़ून का रिश्ता जताया है॥
वो शख़्स हमसे बेहतर, लगता फ़ोन पे रिश्ता आया है।
हालात बुरे हैं, कहकर तुमने कुछ दोस्त नए बनाए हैं,
कुछ पुराने भी यही सच्च समझकर फ़िरसे मिलने आए हैं॥
अब क्या करे कुछ रोग लगाकर छोड़ दिया मंझ-धार में,
ना कस्ती मिली ना किनारे हुए इस क़दर मोड़ दिया इक़रार ने॥
क़हते सुनते बिलख़-बिलख़ कर पहुंचे उसी देश में वापस,
जिससे आज़ादी को समझा हमने इक उम्दा सोच कभी॥
राहे बदली, लोग बदले, ना बदला वो इक शख़्स कभी,
बदल दिया अपना संसार जिसके पीछे हमनें अभी॥
वो दोस्त हमारे क़हते रहे तू बदला-बदला सा लगता है,
पर ना परवाह उस रिश्ते की,
हाँ, ठीक, बिल्कुल सही तू दोस्त हमारा कहता है॥
By Paras Minhas

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