सच और झूठ
By Dr. Hari Mohan Saxena
सच और झूठ की विकट लड़ाई
आदि काल से चलती आई,
जीत अंत में सच की होती
मगर झूठ को समझ न आई।
झूठ शुरू में मोहक लगता
करके खूब रंगाई पुताई,
कच्चे रंग कहाँ टिकते हैं
हों बदरँग जब होए धुलाई।
मीठी मीठी बातें करके
झूठ फरेब अनेकों करते,
कुछ दिन झूठ भले चल जाए
भेद खुले तब वह फँस जाए।
क्षणिक लोभ और लाभ की खातिर
अपराधी बन जाते शातिर,
अपनी इज़्ज़त दाँव लगाते
देर सबेर वो पकड़े जाते।
सत्य शुरू में कड़वा लगता
किन्तु अहित नहीं वह करता,
सत्य मनुज को निर्भय करता
कठिन परीक्षा से नहीं डरता।
सीख सदा से चलती आई
सच का दामन थामो भाई
झूठ का रास्ता छोड़ समय पर
सुखी रहो तुम सत्य बोलकर।
By Dr. Hari Mohan Saxena

Very nice wording and meaningful
wow!
Good
यह कविता सत्य-असत्य के शाश्वत संघर्ष को अत्यंत सरल, स्पष्ट और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। झूठ की क्षणिक चमक और सत्य की दीर्घकालिक शक्ति—दोनों का सुंदर तुलनात्मक चित्रण है। कवि ने बड़ी सहजता से यह संदेश दिया है कि सत्य भले कठोर लगे, पर अंततः वही मनुष्य को निडर, सम्मानित और सुखी बनाता है। भाषा सरल है, भाव गहरे हैं, और सीख जीवनोपयोगी—कविता हृदय को छू जाती है।
Very Nice 👌