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संवाद(Conversation)

Nov 16, 2022
3 min read

By Amit Sharwa


चलो आज संवाद करें,

आपही से वाद-विवाद करें

ये मौन की भीत अपने दरमियां,

वाणी से इसपे आघात करें।


दबके रहता है क्यों,

क्यों सहमा सा

क्यों काँपता रहता,

जग में निकलता ना

नर्म आहट भी,

चीर देती तेरा कलेजा

दुनिया का छोड़,

करेना सामना तू आईने का!


कौनसी जड़ जकड़े है तुझे,

क्यों डाली की भांति धूजे

अंतर्मन की आज झलक दे

विष का प्याला आज छलक दे।


आघात की बात क्या छेड़ दी तुमने!

जख्मों की खाल उधेड़ दी तुमने

मक्खियां अब इन पर भिनभिनाएगी

अपना हिस्सा नोच ले जाएगी।


तभी तो होंठ चिपकाए रहता हूं

तभी विष का प्याला खुद पीता हूं

गम का आलाप क्या भरु

बेहतर है के मौन मरु।


और तु है कौन,

क्यों देने आया दिलासा है?

पुछता है हाल मेरा,

लगता तुझे भी मुझेसे अभिलाषा है!


हाय!

ये बात ना तुमने ठीक कही

मेरी करुणा को भीख कही?

हंस से हंस भेदते हो,

क्या खिंची तुमने ये लीक सही?


मैं तेरे सुख में हँसता हूँ,

मैं तेरे दुख में सिसकता हूँ

मेरा अस्तित्व ना तोड़ तू

पौधे का तना ना मरोड़ तू।





जैसे नूर और चंद्रमा अलग नहीं,

चादर और धागा अलग नहीं,

हम साथ में हल निकालेंगे,

दोनों की बाधा नहीं।


ओ साथी!

मैं क्या करूं,कुछ समझ नहीं?

मुझे दुनिया की सूझबूझ नहीं

दुविधा में पड जाता हूँ,

पत्तों सा मैं झड जाता हूँ।


बल तो शेष है मुझमें,

योद्धा का भेष है मुझमें,

बस!खुदपे विश्वास कम करता हूँ,

मैं अकसर समर से डरता हूँ।


जब विचारों को सम्मत करू,

कुछ कहने कि हिम्मत करू,

स्वर कंठ में ही सुलग जाते है

बोल, करतब दिखला नहीं पाते है।


साथी!

ये किसके साथ नहीं होता

आरंभ में मंजिल का नाप नहीं होता

होता नहीं कोई शुरू से वीर,

पसीने से धोनी पड़ती तकदीर।


मैं जानता हूं तू काबिल है,

वीरगुण तुझमें शामिल है,

हर बुझे को रोशन तू कर दे,

तू है उजाला,तू झिलमिल है।


खुद को कष्टों में चूर तू

घनघोर तमस में नूर तू

समाया है तुझमें ब्रह्मांड

भले है कण,पर पुर तू।


पर!

मुझे है लगता जहाँ बाजार में,

मेरे गुणों का मोल सस्ता है

तुम तो कहते हो नूर मुझे पर,

अंधकार भी मुझपर हंसता है।


क्या मुरझाए फूलों से तुम,

निचोड़ सकते हो रस को?

क्या बुझी हुई शम्मा से तुम,

रौंद सकते हो तमस को?


मैं हूं मही में गड़ा हुआ,

क्या खाक! घटा में चाहूंगा

मैं तो हूं कण,मरता क्षण क्षण

यूं ही ब्रह्मांड में समा जाऊंगा।


पौधे के भी आगे,

बौना लगता हूं

अब किसी को नहीं मैं,

लुभावना लगता हूं।


किसे बनाऊं बैसाखी,

जो दे सके मुझे सहारा

सफलता को भाती नहीं,

अब वृद्घ पसीनो की धारा।


सुन सखा!

इन आंधियों से भयभीत ना हो,

क्या हुआ,जो संग कोई 'मीत' ना हो,

खुदमें ईश्वर का वास रख,

डोले ना,अटल विश्वास रख।


लक्ष्य को तू भाग्य में रमा दे,

भय को पैरों की धूल चखा दे,

इन कायरों से क्यों डरता है

इन्हें अपनी हथेली में दबा दें।


सबके समस्त खाली क्यों हो जाता,

जो एकांत में छलकता है तुझमें?

समझे खुद को क्यों,कूचा,गली,

जब पूर,नगर, है बस्ता तुझमें?


कायरता के मुख से,धड़ को अलग कर,

सौर्य के तीर से,छाती इसकी छलनी कर

राजा का स्थान हडपे बैठा है ये,

धूल में मिला कर,मोल इसका चवन्नी कर।


धुआं कोई ऐसा हो तो बता जो,

आकाश छूने से पहले जला नहीं

ऐसा कोई रण हो तो बता जहां,

वीर का बदन लहू से सना नहीं।


वो अपना तेज जानता है,

सूरज ढलने से नहीं डरता

तलवार से लौ नहीं कटती,

सैलाब मुट्ठी से नहीं दबता।


चट्टान कभी बाढ़ से काँपता नहीं है

वो ढह जाता है मगर भागता नहीं है

जो सोता चिता पे, हो मौत जिसका साथी

उसका होता भय से कोई राबता नहीं है।


तू बात मनुज की करता है?

बख्शा भगवान भी कहा जाता है!


जो लीन थे उसकी भक्ति में,

जिसने सृष्टि बनाई

उनको भी तो नीच मनुज ने,

मृत्यु की राह दिखाई।


मेघ हमेशा झोली में,

वर्षा लिए नहीं चलता है

कभी-कभी जो हार हो,

तो कोई नहीं!चलता है।


हर कोशिश केवल एक कदम है,

नादान, तुझमें धीर नहीं

एक वार से चट्टानों में,

पड़ती कभी है चीर नहीं।


तु समस्त गुणों को इकट्ठा कर,

अपनी भुजाओं से इन्हें चिंगार दे

और अपने पसीने छींट कर,

अपना भविष्य निखार दे।


एड़ीयों में तूफान लिए तू आगे बढ़

मस्तक में अभिमान लिए तू आगे बढ़।


रख तेज ऐसा के तमस का,

सीना काट निकल जाए

तप हो ऐसा के पर्वत भी,

टपक टपक के गल जाए।


जब सारे तुझको दे ठुकरा,


तेरे हक का ना दे टुकड़ा,


तू खुदको अपनी शरण में ला,


हो जा हो जा तू करण हो जा।


हो जा हो जा तू करण हो जा।


By Amit Sharwa



























































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