संवाद
By Kunal Verma
जिंदगी कहती हैं मौत से :
“ कुछ ऐसा लगता है
की यह अब आखिरी आवाज़ है।
बयानात को लफ्ज़ कम पड़ने लगे हैं,
अंदर से, हर रंग के सिहाई, ख़त्म होने लगे हैं,
हम अब अंत की खोज में चल पड़े हैं।
नए पन्ने तो रोज सामने आते हैं
पर हर पन्ने कोरे ही रह जाते हैं
ना पिछले पन्नों से कुछ चुराना बाकी रहता हैं
ना नए पन्नों में कुछ बताना बाकी रहता हैं
कलम हाथ में थामे, हम शून्य में खो चुके हैं
हम तो बस अब अंत की खोज में चल पड़े हैं।
की अब जब, यह मृतक दफन होगा,
उस पर तो सिर्फ, इस कोरे पोथी का कफन होगा,
इस सादगी ने, जिसने मुझे अंत में लपेटा हैं,
याद करो तो, दरअसल इस पर गुमनामी का ही छींटा हैं,
वह छींटे सारे अब हम साफ कर चले हैं,
हम अब बस अंत की खोज में चल पड़े हैं। ”
गले लगाने से पहले, मौत कहती हैं :
“ अंत समय की बात ना कर,
अभी तुझमें जीवन बाकी है।
जीवन के इस मधुशाला में,
अभी मदिरा भी है, साक़ी भी है।
इन कोरे पन्नों की बचे,
हर बात निराली होती है,
जब दिल उदास हो,
तब ये पन्ने,
खाली लगते है,
साथ हो जब तेरा मालिक,
फिर यही दीवाली लगते है।
पतझड़ बीता,
नई ऋतु आयी,
पूरा बसंत अभी बाकी है,
अंत समय की बात ना कर,
अभी तुझमें जीवन बाकी है। ”
By Kunal Verma

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