संभलकर चल तो लेता मैं
By Kuldeep Kumar
संभलकर चल तो लेता मैं दिख अगर राह कभी जाती,
यूँ ना लड़खड़ाता मैं अगर कहीं निगाहें जम कभी जाती,
टूट कर बिखरता ना इस तरह से कभी मैं,
जो कुछ करने की ख्वाइशें तोड़ दम नहीं जाती।
"संभलकर चल तो लेता मैं दिख अगर राह कभी जाती।"
बताते थे दुनियां वाले दास्ताँ मायुसियत वालीं मुझे,
सुनाते थे अक्सर हारकर बिखरने वालों की कहानी मुझे,
कहते कि मेहनत तेरे जैसों की कभी भी रंग नहीं लाती।
संभलकर चल तो लेता मैं दिख अगर राह कभी जाती,
परेशान हो चुका था मैं कि दिखाई कोई राह नहीं दी थी,
किसी भी मोड़ पर हौंसले की किसी ने सलाह नहीं दी थी।
एक तिनके के सहारे जितनी हिम्मत अगर बन कभी जाती,
संभलकर चल तो लेता मैं दिख अगर राह कभी जाती,
फिर सुनी एक रोज एक आवाज जानी पहचानी सी,
थी मेरे दिल की वो आवाज जो पहले थी अनजानी सी,
बोली विश्वास खुद पर करता तो हिम्मत हो तभी जाती,
संभलकर चल तो लेता मैं दिख अगर राह कभी जाती।
By Kuldeep Kumar

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