संघर्ष की चादर
By Anip Kumar
हर रोज जगते है हम, हर रोज लड़ते हैं हम,
गमो की चुस्कियों को जीवन के प्याले मे पीते हैं हम।
यूँ तो खुसियों की चाहते लेकर जन्मे थे हम,
चाहते कब खुसियाँ देती हैं, ना समझे थे हम।
संघर्ष की चादर ओढ़ हर रोज सोते है हम,
सुबह भींगी तकिया देख एहसास होता है,
नींद मे भी रोते है हम!
ख्वाब देखना भी शायद मुकद्दर को मंजूर नही,
रात सोने से अब लगता है डर ,
की फिर से कोई तकिया भींग जाए नही।
किस से कहूँ मेरी ये कहानी,
झूठी हँसी मे है दफन मेरी जिंदगानी।
ना करे जो कोई यकीन तो ,
उसमे उनका कोई दोष नही,
मुझे तो रंजीश है बस उस खुदा से,
किसी और से कोई रोष नही।
अब तो बस इतनी सी है इबादत उस रहनुमा से,
दे दे इनाम मेरे भी हर रोज की इस जद्दोजहद की,
ताकि तोड़ लाऊँ खुसियों की चंद पत्तियाँ संघर्ष की बगांन से।
पी कर चंद चुस्कियां आनंद के ,
मुक्त हो सकु मन की इस थकान से।
जीवन संघर्ष है ये मेरा, लड़ना भी है मुझको ही,
जीतूँगा ये जंग जरूर , ये यकीन तो है तुझको भी।
By Anip Kumar

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